मनोज जोशी का कॉलम:ट्रम्प का अमेरिका अब हमारे लिए भरोसेमंद नहीं लगता…

बीते एक साल में भारत और अमेरिका के रिश्तों में कई निराशाजनक पड़ाव आए हैं। ट्रम्प के भारत-पाक युद्ध में मध्यस्थता के दावे को लेकर विवाद, रूसी तेल आयात के कारण लगाए टैरिफ, पाकिस्तान को अहमियत देना आदि। इस साल की शुरुआत में
मनोज जोशी का कॉलम:ट्रम्प का अमेरिका अब हमारे लिए भरोसेमंद नहीं लगता। यह जानकारी ताज़ा है और आगे इसमें अपडेट संभव है।
जो भी जानकारी अब तक सामने आई है, उसे स्पष्ट और सरल भाषा में यहां पेश किया जा रहा है।
क्या बदला
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर स्थिति सामने रखी जा रही है। अधिक विवरण मिलने पर खबर को अपडेट किया जाएगा।
मुख्य बातें
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इस बीच मिली अतिरिक्त जानकारी के अनुसार, US-India relations analysis, Indo-Pacific policy, and geopolitical shifts. ट्रम्प के नेतृत्व वाला अमेरिका अब उतना भरोसेमंद नहीं दिखाई देता।
अब तक क्या सामने आया है
बीते एक साल में भारत और अमेरिका के रिश्तों में कई निराशाजनक पड़ाव आए हैं। ट्रम्प के भारत-पाक युद्ध में मध्यस्थता के दावे को लेकर विवाद, रूसी तेल आयात के कारण लगाए टैरिफ, पाकिस्तान को अहमियत देना आदि। इस साल की शुरुआत में दोनों देशों के बीच ट्रेड डील को लेकर उम्मीदें थीं, लेकिन नई दिल्ली में वार्ता और दावों के बावजूद इसमें भी कुछ ठोस हाथ नहीं लग पाया है। भारत पर पहले ही यूएस ट्रेड रिप्रजेंटेटिव की ओर से सेक्शन 301 के तहत प्रस्तावित 12.5% अतिरिक्त टैरिफ का खतरा मंडरा रहा है। यह ट्रैरिफ कथित तौर पर बंधुआ मजदूरी के जरिए बनी वस्तुओं के आयात के आरोप में प्रस्तावित किया गया है। अब ऐसी खबरें भी हैं कि यदि अमेरिकी कांग्रेस में एक बिल पारित हो जाता है तो रूसी तेल आयात करने के कारण भारत पर 100% दंडात्मक टैरिफ भी लगाया जा सकता है। अमेरिका ने 8-9 जुलाई को चाबहार बंदरगाह समेत ईरान के सैन्य ठिकानों पर जबरदस्त हमले किए। इसी माह की शुरुआत में हुए हमलों में भारत द्वारा संचालित शाहिद बेहेश्ती पोर्ट टर्मिनल का वॉच टावर भी ध्वस्त कर दिया गया। पिछले साल के आखिर में ईरान युद्ध शुरू होने से पहले ही अमेरिका ने चाबहार परियोजना को लेकर भारत पर प्रतिबंध लगा दिए थे। भारत ने बीते एक दशक में इस परियोजना पर काफी धन और प्रयास खर्च किए थे। ईरान युद्ध में भारत द्वारा अमेरिका-इजराइल पक्ष का समर्थन करने का भी इन हालात पर कोई फर्क नहीं पड़ा। इसके बावजूद भारतीय नाविकों वाले जहाजों पर अमेरिकी हमले हुए, जिनमें लोग मारे गए। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत के कूटनीतिक विरोध को खारिज करते हुए कह दिया कि नाकेबंदी का उल्लंघन स्वीकार नहीं होगा। हिन्द-प्रशांत क्षेत्र के प्रति अमेरिकी रवैया भी उतना ही चिंताजनक है। इस क्षेत्र में चीन का मुकाबला करने के लिए ‘क्वाड’ जैसे मंचों के जरिए भारत को प्रमुख साझेदार माना जाता था। 2025 में भारत में क्वाड समिट होनी थी और उम्मीद थी कि ट्रम्प इसमें शामिल होंगे। लेकिन समिट नहीं हो पाई और इस वर्ष भी होने की संभावना नजर नहीं आती। इधर अमेरिका और चीन की नजदीकी बढ़ रही है। मई में ट्रम्प ने चीन यात्रा की और अब सितंबर में जिनपिंग की अमेरिका यात्रा संभावित है। ऐसे में लगता है कि अमेरिका ने अपनी इंडो-पैसिफिक नीति के औचित्य को ही कमजोर कर दिया है। शायद इसी की पुष्टि के लिए अमेरिका की इंडो-पैसिफिक कमांड ने हाल ही में अपना पुराना नाम ‘यूएस पैसिफिक कमांड’ फिर से रख लिया। हमें यह भी समझना होगा कि तथाकथित ‘मिडिल पावर्स’ अपने दम पर चीन का सामना करने में अक्षम हैं। परंपरागत रूप से यह अमेरिका ही है, जो दक्षिणी चीन समुद्र और ताइवान की खाड़ी में चीन की आक्रामकता को चुनौती देने की ताकत मुहैया कराता रहा है। ट्रम्प के नेतृत्व वाला अमेरिका अब उतना भरोसेमंद नहीं दिखाई देता। लेकिन माहौल में बदलाव दिख रहा है। जापान का सैन्य विस्तार अब आकार लेने लगा है। 2027 तक जापान रक्षा खर्च के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन जाएगा। भारत को भी दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी सैन्य तैनाती और गतिविधियों को तेज करना होगा। फिलीपींस और इंडोनेशिया को ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम बेचकर उसने बेहतर शुरुआत की है। भारत अपनी हिन्द-प्रशांत रणनीति को अमेरिका के भरोसे नहीं छोड़ सकता। जिस रणनीतिक जिम्मेदारी को वहन करने का वचन कभी क्वाड ने दिया था, वो अब भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के कंधों पर आ गई है। ऐसे में हमारा काम ऐसी संतुलनकारी ‘मिनिलेटरल व्यवस्था’ बनाना है, जो अमेरिकी रुख से प्रभावित हुए बिना हिन्द-प्रशांत क्षेत्र को संभाल सके। अमेरिका ने 8-9 जुलाई को चाबहार बंदरगाह समेत ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमले किए। भारत द्वारा संचालित शाहिद बेहेश्ती पोर्ट टर्मिनल का वॉच टावर भी ध्वस्त कर दिया। हमने बीते एक दशक में इस परियोजना पर काफी धन और प्रयास खर्च किए थे। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
प्रसंग
यह खबर "मनोज जोशी का कॉलम:ट्रम्प का अमेरिका अब हमारे लिए भरोसेमंद नहीं लगता" से जुड़ी है। अब तक जो जानकारी सामने आई है, उसका सार है: बीते एक साल में भारत और अमेरिका के रिश्तों में कई निराशाजनक पड़ाव आए हैं। ट्रम्प के भारत-पाक युद्ध में मध्यस्थता के दावे को लेकर विवाद, रूसी तेल आयात के कारण लगाए टैरिफ, पाकिस्तान को अहमियत देना आदि। इस साल की शुरुआत में दोनों देशों के बीच ट्रेड डील को लेकर उम्मीदें थीं, लेकिन नई
ऐसी खबरों में शुरुआती अपडेट और अंतिम तस्वीर के बीच अक्सर कुछ अंतर होता है। पाठकों के लिए मुख्य घटना, उसका असर और आगे आने वाले अपडेट को अलग-अलग समझना मददगार रहता है।
अपराध, अदालत, राजनीति, स्वास्थ्य या वित्त जैसे संवेदनशील विषयों में स्थिति समय के साथ बदल सकती है, इसलिए इस पर आगे भी अपडेट दिया जाएगा।
पाठकों पर असर
पाठकों के लिए यह खबर इसलिए अहम है क्योंकि यह तेजी से बदलते घटनाक्रम का संक्षिप्त, स्रोत-आधारित और साफ संदर्भ देती है।
NewzQuest दृष्टिकोण
NewzQuest की नजर में यह एक शुरुआती लेकिन महत्वपूर्ण घटनाक्रम है, जिस पर आने वाले समय में और स्पष्टता आने की उम्मीद है।
आगे क्या देखना है
- इस मुद्दे पर आने वाला अगला आधिकारिक बयान।
- इसका आम लोगों और स्थानीय समुदाय पर पड़ने वाला असर।
- आने वाले दिनों में सामने आने वाले नए घटनाक्रम।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
यह अपडेट पाठकों के लिए इसलिए अहम है क्योंकि यह तेजी से बदलती खबर पर शुरुआती संदर्भ देता है।
NewzQuest सटीक और जिम्मेदार रिपोर्टिंग के लिए प्रतिबद्ध है। अगर आपको इस खबर में कोई त्रुटि नजर आती है, तो कृपया हमें सूचित करें।
आगे क्या
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