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Mirzapur The Movie Review | Ravi Kishan का स्वैग कालीन भैया के दबदबे पर भारी, लेकिन कमज़ोर क…

September 14, 2026 | by Ritika Verma

Mirzapur The Movie Review | Ravi Kishan का स्वैग कालीन भैया के दबदबे पर भारी, लेकिन कमज़ोर क…

Mirzapur The Movie Review | Ravi Kishan का स्वैग कालीन भैया के दबदबे पर भारी, लेकिन कमज़ोर क्लाइमैक्स ने फीका किया मज़ा। यह जानकारी ताज़ा है और आगे इसमें अपडेट संभव है।

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क्या बदला

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मुख्य बातें

  • Main development: Mirzapur The Movie Review | Ravi Kishan का स्वैग कालीन भैया के दबदबे पर भारी, लेकिन कमज़ोर क्लाइमैक्स ने फीका किया मज़ा
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इस बीच मिली अतिरिक्त जानकारी के अनुसार, 'मिर्ज़ापुर' का नाम सुनते ही सबसे पहले बंदूकें, गालियां, खून-खराबा, बदला, सत्ता और भौकाल जैसी चीज़ें दिमाग में आती हैं। तीन सीज़न तक OTT पर तहलका मचाने के बाद, यह मशहूर दुनिया अब बड़े पर्दे पर सिनेमाई अंदाज़ में लौट आई है।

अब तक क्या सामने आया है

'मिर्ज़ापुर' का नाम सुनते ही सबसे पहले बंदूकें, गालियां, खून-खराबा, बदला, सत्ता और भौकाल जैसी चीज़ें दिमाग में आती हैं। तीन सीज़न तक OTT पर तहलका मचाने के बाद, यह मशहूर दुनिया अब बड़े पर्दे पर सिनेमाई अंदाज़ में लौट आई है। 'मिर्ज़ापुर द मूवी' वेब सीरीज़ का महज़ अगला हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक अलग टाइमलाइन और नए नज़रिए के साथ बड़े पर्दे के लिए तैयार की गई एक मसाला एंटरटेनर है।कहानी और प्लॉटफ़िल्म की कहानी मिर्ज़ापुर की गद्दी पर कब्ज़े की पुरानी लड़ाई को एक नए मोड़ के साथ आगे बढ़ाती है। केंद्र में एक बार फिर कालीन भैया (पंकज त्रिपाठी) हैं, जिनकी सत्ता की भूख इस दुनिया को चलाती है। मुन्ना भैया (दिव्येंदु) अपने पिता की मंज़ूरी पाने की ज़द्दोजहद में हैं, वहीं गुड्डू पंडित (अली फ़ज़ल) और बबलू पंडित (जितेंद्र कुमार) सत्ता और दुश्मनी के बीच फंसे हैं। इस बार सबसे बड़ा ट्विस्ट लेकर आते हैं बब्बन बाबूआ (रवि किशन), जो सत्ता पर कब्ज़ा ज़माने के लिए नए खिलाड़ी के रूप में एंट्री लेते हैं। बीना भाभी (रसिका दुगल) भी अपनी चालों से समीकरण बदलती नज़र आती हैं।'मिर्ज़ापुर: द मूवी' की कहानी मिर्ज़ापुर की गद्दी और उस पर कब्ज़े की पुरानी लड़ाई को नए तरीके से आगे बढ़ाती है। कहानी के केंद्र में एक बार फिर पंकज त्रिपाठी यानी कालीन भैया हैं, जिनका दबदबा और सत्ता की भूख इस दुनिया को चलाती रहती है। मुन्ना भैया (दिव्येंदु) अभी भी अपने पिता की मंज़ूरी पाने और गद्दी हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भाई गुड्डू पंडित (अली फ़ज़ल) और बबलू पंडित (जितेंद्र कुमार) की ज़िंदगी सत्ता, परिवार और पुरानी दुश्मनी के बीच फंसी हुई है। इस बार, रवि किशन का किरदार बब्बन बाबूआ कहानी में एक नए खिलाड़ी के तौर पर आता है, जिसकी नज़र मिर्ज़ापुर की सत्ता और कंट्रोल पर है। उसके आने से पहले से ही उलझे हुए समीकरण और भी मुश्किल हो जाते हैं। पुराने रिश्ते, वफ़ादारी, धोखा, बदला और सत्ता की महत्वाकांक्षा – ये सब कहानी में साथ-साथ चलते हैं। बीना भाभी (रसिका दुगल) भी इस सत्ता के संघर्ष में अपनी चालें चलती हैं और कहानी में एक नया मोड़ लाती हैं।गुड्डू और मुन्ना की मौजूदगी पुराने ज़ख्मों को फिर से ताज़ा कर देती है। दूसरी ओर, बबलू की वापसी इस बार एक अलग एक्टर के साथ होती है, जिससे दर्शकों के मन में तुलना होना स्वाभाविक है। सत्ता के संघर्ष के साथ-साथ, कहानी में रिश्तों, वफ़ादारी, प्यार और धोखे के लिए भी जगह है। फ़िल्म कोई बहुत ज़्यादा उलझी हुई या गहरी राजनीतिक कहानी बताने की कोशिश नहीं कर रही है। यह असल में एक मसाला एंटरटेनर है जो मिर्ज़ापुर की स्थापित दुनिया के ज़रिए दर्शकों को थिएटर जैसा अनुभव देना चाहती है। जब ये चीज़ें साफ़ तौर पर सामने आती हैं, तो फ़िल्म मज़ेदार लगती है। समस्या तब शुरू होती है जब यह एक ही समय में बहुत सारे किरदारों और ट्रैक को जगह देने लगती है। कई हिस्से ऐसे हैं जो अलग-अलग तो अच्छे लगते हैं, लेकिन जब सब कुछ एक साथ आता है, तो फ़िल्म थोड़ी बिखरी-बिखरी सी लगने लगती है। OTT कहानी को कई एपिसोड में फैलाने की आज़ादी देता है, लेकिन फ़िल्म में हर सीन का कहानी की रफ़्तार में योगदान होना ज़रूरी है। यहाँ ऐसा हमेशा नहीं होता।मिर्ज़ापुर द मूवी: एक्टिंगपंकज त्रिपाठी, कालीन भैया के तौर पर हमेशा की तरह दमदार हैं, लेकिन उनका स्क्रीन टाइम कम है। उनके और रवि किशन के बीच सीधी टक्कर और भी मज़ेदार होती। रवि किशन, बब्बन बाबूआ के तौर पर छा जाते हैं। जब भी वह स्क्रीन पर आते हैं, आपकी नज़रें उन पर ही टिकी रहती हैं। आप एक पल के लिए भी नज़रें नहीं हटा पाएंगे। वही असली पूर्वांचली अंदाज़ लेकर आते हैं। उनके चलने-फिरने का तरीका और बॉडी लैंग्वेज उन्हें पंकज त्रिपाठी, अली फ़ज़ल और दिव्येंदु शर्मा—तीनों से कहीं ज़्यादा दमदार बनाती है। अली फ़ज़ल (गुड्डू पंडित) और दिव्येंदु शर्मा (मुन्ना भैया) स्क्रीन पर पुरानी यादें ताज़ा करने में कामयाब रहे हैं। दोनों का अंदाज़ वही पुराना वाला है। उनका जुनून भरा अंदाज़ आज भी वैसा ही है, जैसा पहले था।बिरजू लोहार के रोल में मोहित मलिक कहानी में एक नया मोड़ लाते हैं। क्लाइमेक्स तक पहुँचने से पहले ऐसा लगता है कि कहानी उन्हीं के इर्द-गिर्द घूम रही है। उनकी एक्टिंग ज़बरदस्त है। उनकी वफ़ादारी, प्यार और खतरनाक स्वभाव उनकी परफॉर्मेंस में साफ़ झलकते हैं। [स्पॉइलर अलर्ट]: लेकिन अगर यह किरदार बच जाता, तो चौथे सीज़न में उनसे बहुत उम्मीदें होतीं। यह मोहित मलिक की दूसरी फ़िल्म है। इससे पहले वह टीवी के बड़े स्टार थे। सालों बाद उनके टैलेंट को पहचाना गया और उन्हें जो मौका मिला, उसका उन्होंने पूरा और सही इस्तेमाल किया। रसिका दुगल एक बार फिर कमाल करती हैं। क्लाइमेक्स में कहानी को वही मोड़ती हैं। बीना भाभी के रोल में रसिका ने वही पुराना असर छोड़ा है।सोनाली चौहान ने मुमताज़ बीबी का रोल किया है। उनका रोल छोटा है, लेकिन वह इस किरदार में एकदम सही हैं। रवि किशन के साथ उनकी जोड़ी बहुत अच्छी लगती है। उनकी सहज सुंदरता से नज़रें हटाना आसान नहीं है। जितेंद्र कुमार ने बबलू पंडित का रोल किया है। विक्रांत मैसी ने मिर्ज़ापुर सीरीज़ में यह किरदार इतनी शानदार ढंग से निभाया था कि इस रोल से उनकी छाप मिटाना नामुमकिन है। इसीलिए, जितेंद्र चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, वह वैसा असर नहीं छोड़ पाते जैसा विक्रांत ने छोड़ा था। वह अच्छे एक्टर हैं, लेकिन यह किरदार उनके लिए नहीं बना था। इस पर पहले से ही विक्रांत मैसी का नाम लिखा हुआ है।गुड्डू और बबलू की माँ वसुधा के रोल में शीबा चड्ढा बेहतरीन हैं। गुड्डू के पिता के रोल में राजेश तैलंग भी प्रभावशाली हैं। वह जानते हैं कि कम स्क्रीन टाइम में भी अपनी दमदार परफॉर्मेंस से कैसे असर छोड़ा जाए। कहानी ने भैरव सिंह करनावत के रोल में सुशांत सिंह के साथ नाइंसाफ़ी की है। इतने टैलेंटेड एक्टर कहानी में और भी मज़बूत जगह के हक़दार थे। आपको बार-बार लगेगा कि उनका पूरा इस्तेमाल नहीं किया गया, जबकि उन्हें फ़िल्म जगत के शुरुआती गैंगस्टर्स में से एक माना जाता है। राम गोपाल वर्मा की लगभग हर फ़िल्म में उनका हुनर ​​साफ़ दिखता था। बाबू जी के रोल में कुलभूषण खरबंदा एकदम सही हैं। कंपाउंडर के रोल में अभिषेक बनर्जी भी ठीक-ठाक हैं, लेकिन अगर वह कहानी में न होते तो भी कोई खास फ़र्क नहीं पड़ता। उनका रोल और भी छोटा हो सकता था और उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। 'लापता लेडीज़' के एक्टर सतेंद्र सोनी भी अपने छोटे से रोल में अच्छे लगे हैं। शाजी चौधरी एक बार फिर मकबूल के रोल में अच्छे हैं। प्रमोद पाठक ने जेपी यादव के रोल के साथ न्याय किया है। श्रिया पिलगांवकर, हर्षिता गौर और श्वेता त्रिपाठी के होने या न होने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता।एक्शन, डायरेक्शन और विज़ुअल ट्रीटमेंटनिर्देशक गुरमीत सिंह ने मिर्ज़ापुर के ओरिजिनल फ्लेवर को बनाए रखने की पूरी कोशिश की है। बड़े पर्दे के हिसाब से गैंग वॉर, कार चेज़ और आमने-सामने की भिड़ंत को काफी भव्य पैमाने पर शूट किया गया है। राजस्थान की लोकेशंस और बैकग्राउंड स्कोर फ़िल्म को एक सिनेमाई स्केल देते हैं। हालांकि, हर एक्शन सीन उतना असरदार नहीं है, खासकर वह जिसमें रवि किशन और अली फज़ल हैं। कुछ जगहों पर ऐसा लगता है कि एक्शन को कहानी से स्वाभाविक रूप से निकलने के बजाय सिर्फ़ दर्शकों में उत्साह पैदा करने के लिए जोड़ा गया है। बड़े सेटअप के बावजूद, हर सीन में उतना इमोशनल वजन नहीं है।मिर्ज़ापुर द मूवी: डायरेक्शनगुरमीत सिंह जानते हैं कि मिर्ज़ापुर के दर्शक क्या चाहते हैं। उन्होंने फिल्म के ट्रीटमेंट में पुराने मिर्ज़ापुर वाले फ्लेवर को बनाए रखने की कोशिश की है। डायलॉग, किरदारों का व्यवहार, हिंसा और रिश्तों में कड़वाहट – ये सभी ओरिजिनल सीरीज़ की पहचान को बनाए रखते हैं। डायरेक्शन तब सबसे मज़बूत होता है जब यह किरदारों को आमने-सामने लाता है। पुराने चेहरों को एक साथ देखने का उत्साह और उनके बीच की केमिस्ट्री कई सीन में अतिरिक्त ऊर्जा भर देती है। लेकिन डायरेक्शन के साथ सबसे बड़ी समस्या फिल्म की लंबाई और रफ़्तार है। कई जगहों पर आपको लगता है कि एडिटिंग टेबल पर फिल्म को थोड़ा छोटा और कसा हुआ करने की ज़रूरत थी। कुछ सीन कहानी को आगे बढ़ाए बिना ही दुनिया का विस्तार करते हैं। इस वजह से, दूसरे हाफ में कई बार रफ़्तार धीमी हो जाती है।फ़िल्म की मुख्य कमियांधीमी रफ़्तार और लंबाई: फ़िल्म की लंबाई बहुत ज़्यादा है। अनावश्यक गानों और मुन्ना भैया की बेइज्जती वाले सीन काटकर इसे छोटा किया जा सकता था। कमज़ोर क्लाइमैक्स: पूरी फ़िल्म में बब्बन बाबूआ (रवि किशन) को बेहद ताकतवर दिखाया गया, लेकिन क्लाइमैक्स में उनका अंत बहुत आसानी से और निराशाजनक तरीके से कर दिया गया। लॉजिक की कमी: एक सीन में गंभीर रूप से घायल गुड्डू पंडित को 'ऊंट वाले इंजेक्शन' से अचानक हल्क जैसी ताकत मिलते हुए दिखाया गया है, जो थोड़ा अजीब लगता है। सेंसर बोर्ड का असर: अगर आप सीरीज़ जैसे अत्यधिक बोल्ड सीन, गालियां और खून-खराबे की उम्मीद कर रहे हैं, तो थिएटर में यह सब काफी सीमित मात्रा में देखने को मिलेगा।मिर्ज़ापुर द मूवी: क्या चीज़ें अच्छी हैं?कहानी की सबसे बड़ी ताकत मिर्ज़ापुर की दुनिया और उसके किरदारों का असर है। यह फ़िल्म उन रिश्तों और पावर गेम्स को बड़े पर्दे पर लाती है जिन्होंने इस फ़्रैंचाइज़ी को पहचान दिलाई थी। कालीन भैया की वापसी कहानी को सबसे ज़्यादा मज़बूती देती है। उनका शांत लेकिन खतरनाक अंदाज़ आज भी दर्शकों पर असर डालता है, भले ही उनका रोल छोटा हो।गुड्डू, मुन्ना और बबलू के बीच पुरानी केमिस्ट्री और तनाव भी कहानी को दिलचस्प बनाए रखते हैं। साथ ही, बब्बन यादव के तौर पर रवि किशन की एंट्री कहानी में नया रंग भरती है। उनका किरदार पुराने खिलाड़ियों के लिए एक नई चुनौती पेश करता है। सत्ता, परिवार, वफ़ादारी और धोखे के बीच बदलते समीकरण दिलचस्प हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि फ़िल्म सिर्फ़ एक्शन पर निर्भर नहीं है। यह अपने किरदारों के रिश्तों और महत्वाकांक्षाओं को भी जगह देती है। पुराने और नए का यह तालमेल इसे मनोरंजक बनाता है।क्या मिर्ज़ापुर: द मूवी देखने लायक है?हाँ, लेकिन आपको अपनी उम्मीदों को थोड़ा संतुलित रखना होगा। अगर आप मिर्ज़ापुर के फ़ैन हैं और अपने पसंदीदा किरदारों को बड़े पर्दे पर देखना चाहते हैं, तो फ़िल्म आपको कई ऐसे पल देती है जो थिएटर जाने को सार्थक बनाते हैं। डायलॉग्स पर रिएक्शन मिलेंगे, एक्शन पर सीटियाँ बजेंगी और पुराने किरदारों की वापसी पुरानी यादें ताज़ा कर देगी।लेकिन अगर आप ऐसी फ़िल्म की उम्मीद कर रहे हैं जो मिर्ज़ापुर की दुनिया को बिल्कुल नए स्तर पर ले जाए, तो आप निराश हो सकते हैं। फ़िल्म में आइडिया या किरदारों की कमी नहीं है। समस्या तो इसके ठीक उलट है। इतनी सारी चीज़ें हो रही हैं कि कहानी को खुलकर आगे बढ़ने के लिए बहुत कम जगह मिलती है।मिर्ज़ापुर: द मूवी में वह 'भौकाल' है, पुराने किरदारों का आकर्षण है, दमदार परफ़ॉर्मेंस है और कई ऐसे पल हैं जो थिएटर में आपका मनोरंजन कर सकते हैं। रवि किशन फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बनकर उभरते हैं, जबकि पंकज त्रिपाठी, अली फ़ज़ल, दिव्येंदु शर्मा और रसिका दुग्गल अपने-अपने किरदारों की पहचान बनाए रखते हैं। समस्या यह है कि फ़िल्म की लंबाई, बहुत सारी स्टोरीलाइन और कुछ कमज़ोर क्रिएटिव फ़ैसले इसे एक यादगार सिनेमाई अनुभव बनने से रोकते हैं, जो यह बन सकती थी। अगर फ़िल्म छोटी होती, कुछ फ़ालतू हिस्से हटा दिए जाते और क्लाइमैक्स को और असरदार बनाया जाता, तो इसका असर कहीं ज़्यादा ज़बरदस्त हो सकता था। फिर भी, बड़े पर्दे पर मिर्ज़ापुर की दुनिया को देखने का मज़ा ही कुछ और है। यह फ़िल्म एकदम बेहतरीन तो नहीं है, लेकिन पूरी तरह से निराश भी नहीं करती।

प्रसंग

यह खबर "Mirzapur The Movie Review | Ravi Kishan का स्वैग कालीन भैया के दबदबे पर भारी, लेकिन कमज़ोर क्लाइमैक्स ने फीका किया मज़ा" से जुड़ी है। अब तक जो जानकारी सामने आई है, उसका सार है: 'मिर्ज़ापुर' का नाम सुनते ही सबसे पहले बंदूकें, गालियां, खून-खराबा, बदला, सत्ता और भौकाल जैसी चीज़ें दिमाग में आती हैं। तीन सीज़न तक OTT पर तहलका मचाने के बाद, यह मशहूर दुनिया अब बड़े पर्दे पर सिनेमाई अंदाज़ में लौट आई है। 'मिर्ज़ापुर द मूवी' वेब सीरीज़ का महज़ अगला हिस्सा नहीं ह

ऐसी खबरों में शुरुआती अपडेट और अंतिम तस्वीर के बीच अक्सर कुछ अंतर होता है। पाठकों के लिए मुख्य घटना, उसका असर और आगे आने वाले अपडेट को अलग-अलग समझना मददगार रहता है।

अपराध, अदालत, राजनीति, स्वास्थ्य या वित्त जैसे संवेदनशील विषयों में स्थिति समय के साथ बदल सकती है, इसलिए इस पर आगे भी अपडेट दिया जाएगा।

पाठकों पर असर

पाठकों के लिए यह खबर इसलिए अहम है क्योंकि यह तेजी से बदलते घटनाक्रम का संक्षिप्त, स्रोत-आधारित और साफ संदर्भ देती है।

NewzQuest दृष्टिकोण

NewzQuest की नजर में यह एक शुरुआती लेकिन महत्वपूर्ण घटनाक्रम है, जिस पर आने वाले समय में और स्पष्टता आने की उम्मीद है।

आगे क्या देखना है

  • इस मुद्दे पर आने वाला अगला आधिकारिक बयान।
  • इसका आम लोगों और स्थानीय समुदाय पर पड़ने वाला असर।
  • आने वाले दिनों में सामने आने वाले नए घटनाक्रम।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

यह अपडेट पाठकों के लिए इसलिए अहम है क्योंकि यह तेजी से बदलती खबर पर शुरुआती संदर्भ देता है।

NewzQuest सटीक और जिम्मेदार रिपोर्टिंग के लिए प्रतिबद्ध है। अगर आपको इस खबर में कोई त्रुटि नजर आती है, तो कृपया हमें सूचित करें।

आगे क्या

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