लीलावती: वो अनसुनी गणितज्ञ जिन्होंने पेड़ के पत्तों तक गिन लिए!

दसवीं शताब्दी की लीलावती, भारत की पहली महान गणितज्ञ। पिता भास्कराचार्य के साथ रची ‘लीलावती’ ग्रंथ ने गणित को काव्य बना दिया। विधवा होने की दुखद कथा से लेकर वैश्विक सम्मान तक, जानिए उनकी अद्भुत कहानी।
दसवीं शताब्दी में दक्षिण भारत की एक लड़की लीलावती ने न सिर्फ गणित को काव्य से सजाया, बल्कि दुनिया भर के स्कूलों में आज भी उनकी रचना पढ़ी जा रही है। विधवा होने की दुखद घटना से प्रेरित होकर पिता भास्कराचार्य ने उन्हें सिखाया, और जन्म हुआ ‘लीलावती’ ग्रंथ का। आइए, इस अनसुने इतिहास को जीवंत करें!

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परिचय: एक पिता-पुत्री की अनोखी गणित यात्रा


कल्पना कीजिए, दसवीं शताब्दी का दक्षिण भारत। जहां ज्योतिष और गणित के पंडितों की धरती पर, एक महान विद्वान भास्कराचार्य अपनी एकमात्र संतान, लीलावती को देखते हैं। लीलावती – नाम ही इतना सुंदर कि लगता है, जैसे जीवन की लीलाओं को समेटे हुए हो। लेकिन यह कहानी सिर्फ सुंदरता की नहीं, बल्कि दर्द, समर्पण और चमत्कार की है।

भास्कराचार्य, जो ‘सिद्धांत शिरोमणि‘ जैसे महाग्रंथ के रचयिता थे, ने ज्योतिष गणना से जान लिया था कि उनकी बेटी का विवाह शुभ न होगा। फिर भी, उन्होंने एक ऐसा लग्न ढूंढा जहां विधवा होने का भय न सताए। लेकिन भाग्य का खेल देखिए – विवाह के शुभ मुहूर्त पर लीलावती के आभूषण से एक मोती गिरा और जलघड़ी का सूराख बंद हो गया। समय बीत गया, विवाह दूसरे लग्न पर हुआ, और लीलावती विधवा हो गईं।

यह दुखद मोड़ ही था जिसने लीलावती को दुनिया की पहली स्त्री गणितज्ञ बना दिया। पिता-पुत्री ने दर्द को ताकत में बदल दिया। भास्कराचार्य ने लीलावती को गणित सिखाना शुरू किया, और थोड़े ही दिनों में वह विषय की पूर्ण पंडिता बन गईं। आज, जब हम गणित को ‘शुष्क’ विषय कहते हैं, लीलावती हमें सिखाती हैं कि यह कला है, काव्य है!

विधवा का दर्द, गणित का सौंदर्य: कैसे बनी लीलावती अमर?
लीलावती के वैधव्य का दुख मिटाने के लिए भास्कराचार्य ने एक अनोखा तरीका अपनाया। उन्होंने गणित के सूत्रों को काव्यात्मक रूप दिया – जैसे कोई कविता हो! “अये बाले लीलावती, हिरन जैसे नयनों वाली प्यारी बिटिया…” ऐसे संबोधन से शुरू होकर, सूत्रों को सरल भाषा में समझाया जाता। बच्चे कंठस्थ करते, फिर प्रश्न हल करते।

सिद्धांत शिरोमणि‘ ग्रंथ के चार भाग हैं: लीलावती (पाटीगणित), बीजगणित, ग्रह गणिताध्याय और गोलाध्याय। इसमें से ‘लीलावती’ अध्याय लीलावती की ही देन है। भास्कराचार्य ने इसे अपनी बेटी के नाम से अमर कर दिया। कल्पना कीजिए, एक पिता अपनी बेटी को जीवित रखने के लिए किताब लिखता है!

एक मजेदार उदाहरण लीजिए: “निर्मल कमलों के एक समूह के तृतीयांश, पंचमांश तथा षष्ठमांश से क्रमश: शिव, विष्णु और सूर्य की पूजा की, चतुर्थांश से पार्वती की और शेष छ: कमलों से गुरु चरणों की पूजा की गई। अये, बाले लीलावती, शीघ्र बता कि उस कमल समूह में कुल कितने फूल थे?” उत्तर? 120! ऐसे प्रश्नों से गणित जिज्ञासा और मनोरंजन बन जाता।

वर्ग, घन, मूल – सब कुछ काव्य में। “मूल” तो पेड़ की जड़ ही है, वर्ग का कारण! लीलावती ने साबित कर दिया कि गणित सिर्फ संख्याएं नहीं, जीवन का उद्गम है।

वैश्विक प्रभाव: फारसी से अंग्रेजी तक, लीलावती की विरासत
लीलावती की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अकबर के दरबार में विद्वान फैजी ने 1587 में इसका फारसी अनुवाद किया। 1716 में जे. वेलर ने अंग्रेजी में। आज, यूरोप से अमेरिका तक, सैकड़ों देशों के स्कूलों में ‘लीलावती’ के सूत्र पढ़ाए जाते हैं। भारत में तो दोहे में गणित सिखाने की परंपरा इसी से चली – “पन्द्रह का पहाड़ा तिया पैंतालीस, चौके साठ…” या कैलेंडर का पद्यमय सूत्र: “सि अप जूनो तीस के, बाकी के इकतीस…”

और आज? गणितज्ञों को ‘लीलावती पुरस्कार’ से सम्मानित किया जाता है। यह पुरस्कार महिलाओं को गणित के प्रचार-प्रसार में योगदान के लिए दिया जाता है। लीलावती की कीर्ति अमर है, क्योंकि “मनुष्य के मरने पर उसकी कीर्ति ही रह जाती है।”

निष्कर्ष:

हमारा खोया इतिहास, आधुनिक दौड़ में नकल क्यों?
हमारे पास लीलावती जैसा सोना है, फिर भी आधुनिकता की दौड़ में विदेशों की नकल कर रहे हैं। लीलावती सिखाती हैं – गणित को प्यार से, काव्य से सिखाओ, तो बच्चे डरेंगे नहीं, आनंद लेंगे। आइए, इस विरासत को संजोएं। क्या आप तैयार हैं अपनी बेटी को ‘लीलावती’ पढ़ाने के लिए?

*क्या आप जानते थे? लीलावती को ‘पेड़ के पत्ते गिनने वाली’ कहा जाता था – इतनी सटीक उनकी गणना!*

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